Chhatrapati Shivaji Maharaj Biography in Hindi: छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन के 10 गौरवशाली अध्याय
1. भारतीय इतिहास के गगनमंडल में एक ऐसे जाज्वल्यमान नक्षत्र का उदय हुआ, जिसने अपनी अद्वितीय वीरता, कूटनीतिक सूझबूझ और जन-कल्याणकारी नीतियों से भारत में एक नए युग का सूत्रपात किया, जिन्हें हम ससम्मान छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम से जानते हैं। उनका जन्म 19 फरवरी 1630 को पुणे के समीप स्थित ऐतिहासिक शिवनेरी दुर्ग में हुआ था, और उनके पिता का नाम शाहजी भोंसले तथा माता का नाम राजमाता जीजाबाई था। उनके पिता बीजापुर सल्तनत के दरबार में एक उच्च पदस्थ सैन्य सेनापति थे, जिसके कारण वे अक्सर घर से दूर रहते थे, अतः बालक शिवराय के चरित्र निर्माण और शिक्षा-दीक्षा का पूरा दायित्व उनकी माता जीजाबाई के कंधों पर आ गया। जीजाबाई ने बचपन से ही शिवराय को रामायण, महाभारत और भारतीय वीरों की शौर्य गाथाएं सुनाकर उनके भीतर राष्ट्रभक्ति, धर्मरक्षा और अदम्य साहस के बीज बोए थे। जीजाबाई के इन उच्च संस्कारों और स्वाभिमान की सीख ने ही बालक शिवाजी को आगे चलकर मुगलों और आदिलशाही शासकों की गुलामी को ठुकराकर "हिंदवी स्वराज्य" (Hindavi Swarajya) की स्थापना करने के लिए प्रेरित किया।
2. शिवाजी महाराज के जीवन को आकार देने और उन्हें एक कुशल योद्धा व दूरदर्शी शासक बनाने में उनके संरक्षक और गुरु दादोजी कोंडदेव की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। दादोजी ने शिवाजी को बहुत छोटी उम्र में ही तलवारबाजी, घुड़सवारी, भाला चलाना, निशाना लगाना और युद्ध कौशल के साथ-साथ सुशासन, न्याय प्रणाली और वित्तीय प्रबंधन की व्यावहारिक शिक्षा दी थी। अपनी किशोरावस्था के दौरान शिवाजी ने पुणे के आसपास के सहाद्रि पर्वत श्रृंखलाओं और बीहड़ जंगलों का गहराई से दौरा किया, जिससे उन्हें भौगोलिक परिस्थितियों का अद्भुत ज्ञान प्राप्त हुआ, जो भविष्य के युद्धों में उनके लिए सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ। इस यात्रा के दौरान उन्होंने स्थानीय पहाड़ी जनजातियों और साहसी मावला (Mavala) युवकों को संगठित करना शुरू किया, जो आगे चलकर उनकी सेना की रीढ़ की हड्डी बने। इन मावला वीरों में तानाजी मालुसारे, बाजी प्रभु देशपांडे और येसाजी कंक जैसे अनमोल रत्न शामिल थे, जो शिवाजी महाराज के अखंड भारत के सपने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार थे।
3. शिवाजी महाराज का क्रांतिकारी सैन्य अभियान तब शुरू हुआ जब वे मात्र 16 वर्ष के थे और उन्होंने विदेशी ताकतों को चुनौती देने का साहसिक निर्णय लिया। वर्ष 1646 में उन्होंने अपनी छोटी सी मावला सेना के साथ मिलकर बीजापुर सल्तनत के अधीन आने वाले अभेद्य तोरणा किले पर अचानक आक्रमण कर दिया और उस पर विजय प्राप्त कर ली, जो उनके विजय रथ की पहली ऐतिहासिक शुरुआत थी। इस किले पर अधिकार करने के बाद उन्हें वहां से बड़ी मात्रा में गुप्त खजाना मिला, जिसका उपयोग उन्होंने अपनी सेना के विस्तार और हथियारों के निर्माण के लिए किया। उन्होंने तोरणा किले का नाम बदलकर "प्रचंडगढ़" रखा और इसके तुरंत बाद चाकन, कोंढाणा (सिंहगढ़) और पुरंदर जैसे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण किलों पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया। उनकी इन शुरुआती और बिजली की तरह तेज विजयों ने बीजापुर के सुल्तान और दिल्ली की मुगल सल्तनत के दरबार में खलबली मचा दी, क्योंकि वे समझ चुके थे कि दक्कन में एक नई और अजेय शक्ति का जन्म हो चुका है।
4. शिवाजी महाराज की बढ़ती शक्ति को कुचलने के लिए बीजापुर की बड़ी बेगम ने वर्ष 1659 में अपने सबसे क्रूर, शक्तिशाली और विशालकाय सेनापति अफजल खान को एक विशाल सेना के साथ भेजा। अफजल खान ने शिवाजी को पकड़ने के लिए मंदिरों को नष्ट किया और जनता पर अत्याचार किए, लेकिन शिवाजी ने धैर्य नहीं खोया और प्रतापगढ़ के घने जंगलों में युद्ध की रणनीति बनाई। 10 नवंबर 1659 को दोनों के बीच प्रतापगढ़ किले की तलहटी में एक व्यक्तिगत मुलाकात तय हुई, जहाँ अफजल खान ने अपनी कुटिल चाल के तहत शिवाजी को गले लगाते समय अपनी बगल में दबाकर कटार से मारने का प्रयास किया। लेकिन दूरदर्शी शिवाजी पहले से ही अपनी पोशाक के नीचे लोहे का कवच पहनकर आए थे और उन्होंने तुरंत अपने हाथों में छिपे "बाघ नख" (Wagh Nakh) से अफजल खान का पेट फाड़कर उसका अंत कर दिया। इस घटना के तुरंत बाद घात लगाकर बैठी मराठा सेना ने बीजापुर की सेना पर जोरदार हमला कर उसे पूरी तरह तबाह कर दिया, जिसने शिवाजी को पूरे भारत में एक महान लोकनायक के रूप में स्थापित कर दिया।
5. दक्कन में शिवाजी महाराज के बढ़ते वर्चस्व से परेशान होकर मुगल सम्राट औरंगजेब ने अपने मामा शाइस्ता खान को डेढ़ लाख की विशाल सेना के साथ पुणे पर अधिकार करने और शिवाजी को बंदी बनाने के लिए भेजा। शाइस्ता खान ने पुणे के लाल महल पर कब्जा कर लिया, जो कि शिवाजी महाराज का बचपन का घर था, और वहां से अपनी दमनकारी गतिविधियां चलाने लगा। इस अपमान का बदला लेने के लिए शिवाजी महाराज ने अप्रैल 1663 की एक तूफानी रात को अपने केवल 400 वफादार सैनिकों के साथ बारात का स्वांग रचकर लाल महल के अंदर एक अत्यंत दुस्साहसिक हमला कर दिया। इस अचानक हुए हमले से शाइस्ता खान के पैर उखड़ गए और जब वह खिड़की से कूदकर भाग रहा था, तब शिवाजी महाराज की तलवार के एक ही वार से उसकी उंगलियां कट गईं। इस साहसिक सैन्य कार्रवाई ने मुगलों के अहंकार को चूर-चूर कर दिया और औरंगजेब को इतनी गहरी ठेस पहुँची कि उसने अपमानित शाइस्ता खान का तबादला तुरंत बंगाल कर दिया।
6. मुगलों को आर्थिक रूप से कमजोर करने और अपनी युद्ध सेना के खर्चे को पूरा करने के लिए शिवाजी महाराज ने वर्ष 1664 में मुगलों के सबसे समृद्ध व्यापारिक केंद्र सूरत बंदरगाह पर हमला कर दिया। मराठा सेना ने बिना किसी आम नागरिक को नुकसान पहुँचाए मुगलों के खजाने को लूटा और करोड़ों रुपये की संपत्ति अर्जित की, जिसने औरंगजेब को क्रोध से भर दिया। इसके बाद औरंगजेब ने मिर्जा राजा जय सिंह के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी, जिसने शिवाजी के किलों को चारों तरफ से घेर लिया और जनता को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। परिस्थितियों की गंभीरता को समझते हुए और अपने लोगों की जान बचाने के लिए शिवाजी महाराज ने वर्ष 1665 में राजा जय सिंह के साथ ऐतिहासिक "पुरंदर की संधि" (Treaty of Purandar) की। इस संधि के तहत शिवाजी को अपने 23 महत्वपूर्ण किले मुगलों को सौंपने पड़े और अपने पुत्र संभाजी को मुगल दरबार में भेजना स्वीकार करना पड़ा, जो उनकी रणनीतिक कूटनीति का एक हिस्सा था।
7. पुरंदर की संधि के बाद राजा जय सिंह के आश्वासन पर शिवाजी महाराज वर्ष 1666 में अपने नौ वर्षीय पुत्र संभाजी के साथ आगरा के मुगल दरबार में औरंगजेब से मिलने पहुंचे। दरबार में औरंगजेब ने उनके साथ एक स्वतंत्र राजा की तरह व्यवहार करने के बजाय उन्हें तीसरी श्रेणी के मनसबदारों के पीछे खड़ा कर दिया, जिससे स्वाभिमानी शिवाजी का खून खौल उठा। उन्होंने भरे दरबार में औरंगजेब को विश्वासघाती कहा और मुगलों के अपमान का कड़ा विरोध किया, जिसके बाद उन्हें आगरा के जयपुर भवन में नजरबंद कर दिया गया। मौत के साए में घिरे होने के बाद भी शिवाजी ने अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया और गंभीर बीमारी का नाटक रचकर साधु-संतों और गरीबों के लिए मिठाई की टोकरियाँ बांटने की अनुमति ली। 17 अगस्त 1666 को वे और संभाजी महाराज उन्हीं मिठाई की टोकरियों में छिपकर मुगलों की कड़ी सुरक्षा से बच निकले और साधु का भेष धारण कर सुरक्षित महाराष्ट्र वापस लौटकर सबको हैरत में डाल दिया।
8. आगरा से सुरक्षित वापस लौटने के बाद शिवाजी महाराज ने नए जोश के साथ मुगलों के खिलाफ अपना अभियान शुरू किया और पुरंदर की संधि में खोए हुए अपने सभी 23 किलों को एक-एक करके वापस जीत लिया। इसके बाद 6 जून 1674 को रायगढ़ के अभेद्य किले में महान विद्वान गागा भट्ट के पुरोहितत्व में शिवाजी महाराज का वैदिक विधि-विधान से भव्य राज्याभिषेक संपन्न हुआ। इस ऐतिहासिक समारोह के साथ ही वे औपचारिक रूप से "छत्रपति" के सिंहासन पर विराजमान हुए और उन्होंने "हिंदवी स्वराज्य" को एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राज्याभिषेक के अवसर पर एक नया कैलेंडर शुरू किया, सोने और तांबे के सिक्के जारी किए और प्रशासनिक कार्यों के सुचारू संचालन के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद "अष्टप्रधान" (Ashta Pradhan) का गठन किया। इस राज्याभिषेक ने दक्षिण के हिंदुओं में एक नया आत्मविश्वास जगाया कि वे भी मुगलों के अत्याचारों के खिलाफ अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित कर सकते हैं।
9. छत्रपति शिवाजी महाराज केवल एक महान विजेता ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी राष्ट्र-निर्माता और युद्ध कला के महान आविष्कारक थे, जिन्होंने "गनीमी कावा" (Guerrilla Warfare) यानी छापामार युद्ध नीति को चरम पर पहुँचाया। वे विदेशी आक्रमणकारियों के समुद्री खतरों को बहुत पहले ही भांप चुके थे, इसलिए उन्होंने कोंकण तट की रक्षा के लिए एक शक्तिशाली मराठा नौसेना (Maratha Navy) का निर्माण किया, जिसके कारण उन्हें सम्मानपूर्वक "भारतीय नौसेना का जनक" (Father of Indian Navy) कहा जाता है। उन्होंने सिंधुदुर्ग, विजयदुर्ग और पद्मदुर्ग जैसे कई विशाल समुद्री किलों का निर्माण कराया ताकि पश्चिमी तटों पर जंजीरा के सिद्दी, पुर्तगालियों और अंग्रेजों के आक्रमणों को रोका जा सके। उनका प्रशासन पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष और न्यायप्रिय था, जहाँ महिलाओं का अत्यधिक सम्मान किया जाता था और युद्ध के दौरान किसी भी मस्जिद, पवित्र ग्रंथ या महिला को नुकसान पहुँचाना पूरी तरह से प्रतिबंधित था, जिसके कारण वे अपनी जनता के लिए साक्षात भगवान तुल्य थे।
10. अपने जीवन के अंतिम दिनों तक स्वराज्य के विस्तार और उसकी सुरक्षा में दिन-रात व्यस्त रहने वाले इस महान राष्ट्रनायक का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने लगा और 3 अप्रैल 1680 को रायगढ़ किले में उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली। मात्र 50 वर्ष की आयु में उनका महाप्रयाण पूरे भारतवर्ष के लिए एक अपूरणीय क्षति थी, लेकिन उनके द्वारा बोए गए स्वराज्य और स्वतंत्रता के बीज आगे चलकर एक विशाल मराठा साम्राज्य के रूप में पल्लवित हुए जिसने अंततः मुगल साम्राज्य का तख्ता पलट दिया। शिवाजी महाराज का जीवन हमें यह सिखाता है कि संसाधनों की कमी होने पर भी यदि आपके पास अटूट इच्छाशक्ति, कूटनीतिक चातुर्य और अपनी मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम है, तो आप दुनिया के सबसे बड़े साम्राज्य से भी लोहा ले सकते हैं। आज भी छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रभक्ति, स्वाभिमान और वीरता की एक नई ऊर्जा का संचार करता है और वे हमेशा हमारे पथ-प्रदर्शक बने रहेंगे।

