1. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में युगपुरुष महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) का नाम स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है, जिन्होंने बिना हथियार उठाए सत्य और अहिंसा के बल पर दुनिया के सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के एक छोटे से तटीय शहर पोरबंदर (Porbandar, Gujarat) में हुआ था। उनके पिता का नाम करमचंद गांधी (Karamchand Gandhi) था, जो ब्रिटिश राज के दौरान राजकोट रियासत के दीवान थे, और उनकी माता का नाम पुतलीबाई (Putlibai) था, जो एक अत्यंत धार्मिक और सरल विचारों वाली महिला थीं। माता पुतलीबाई के धार्मिक संस्कारों और उपवास रखने की आदतों का बालक मोहनदास के कोमल मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा, जिसने उनके भविष्य के नैतिक चरित्र की मजबूत नींव रखी। मात्र 13 वर्ष की अल्पायु में ही उनका विवाह कस्तूरबा गांधी (Kasturba Gandhi) से कर दिया गया था, जिन्हें प्यार से लोग 'बा' कहकर पुकारते थे। शुरुआती दिनों में गांधी जी एक बेहद शर्मीले और सामान्य छात्र थे, लेकिन राजा हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार की पौराणिक कहानियों ने उनके मन में बचपन से ही सत्य, निष्ठा, ईमानदारी और मातृ-पितृ भक्ति के प्रति अटूट आस्था जगा दी थी, जो आगे चलकर उनके जीवन के मुख्य सिद्धांत बने।
2. अपनी प्रारंभिक और माध्यमिक शिक्षा राजकोट से पूरी करने के बाद, मोहनदास के मन में वकालत की पढ़ाई करने की तीव्र इच्छा जागृत हुई, जिसके लिए उन्होंने विदेश जाने का फैसला किया। साल 1888 में वह कानून (Law) की पढ़ाई करने के लिए लंदन, इंग्लैंड चले गए, जहाँ उन्होंने प्रतिष्ठित इनर टेम्पल (Inner Temple) से बैरिस्टर की डिग्री हासिल करने के लिए कठिन परिश्रम शुरू किया। लंदन प्रवास के शुरुआती महीनों में उन्हें ब्रिटिश संस्कृति, रहन-सहन और अंग्रेजी तौर-तरीकों को अपनाने में अत्यधिक कठिनाई का सामना करना पड़ा और उन्होंने खुद को अंग्रेजी जेंटलमैन बनाने की असफल कोशिश भी की। लेकिन जल्द ही उन्हें सादगी की शक्ति का अहसास हुआ और उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा कानून के गंभीर अध्ययन, शाकाहारी जीवन शैली और धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने में लगा दी। इसी दौरान उन्होंने पहली बार भगवद्गीता (Bhagavad Gita) का गहराई से अध्ययन किया, जिसने उनके मन के द्वंद्व को समाप्त कर उन्हें कर्मयोग और निष्काम सेवा का अमूल्य मार्ग दिखाया। वर्ष 1891 में बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त कर जब वे भारत वापस लौटे, तो उन्होंने बॉम्बे (मुंबई) और राजकोट में वकालत शुरू की, लेकिन अत्यधिक संकोची स्वभाव और स्टेज फियर (मंच के डर) के कारण वे अदालत में प्रभावी बहस नहीं कर पाते थे और उनकी शुरुआती वकालत बुरी तरह असफल रही।
3. वर्ष 1893 में गांधी जी के जीवन में एक ऐसा निर्णायक मोड़ आया जिसने उनके पूरे दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा को हमेशा के लिए बदल दिया, जब उन्हें एक व्यापारिक मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका (South Africa) जाने का प्रस्ताव मिला। वहां पहुंचते ही उन्हें तत्कालीन ब्रिटिश और डच औपनिवेशिक शासन के तहत अश्वेतों और भारतीय प्रवासियों के खिलाफ होने वाले भयानक नस्लीय भेदभाव (Racial Discrimination/Apartheid) का सामना करना पड़ा। इस भेदभाव की पराकाष्ठा तब हुई जब एक रात उन्हें पीटरमैरिट्सबर्ग रेलवे स्टेशन (Pietermaritzburg Railway Station) पर वैध फर्स्ट-क्लास टिकट होने के बावजूद सिर्फ उनके रंग के कारण ट्रेन के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया। कड़ाके की ठंड में स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठे-बैठे उन्होंने कायरों की तरह भारत लौटने के बजाय इस अन्याय के खिलाफ डटकर लड़ने का एक ऐतिहासिक संकल्प लिया। उन्होंने साल 1894 में नटाल भारतीय कांग्रेस (Natal Indian Congress) की स्थापना की और वहां रह रहे भारतीयों को एकजुट कर उनके अधिकारों के लिए अहिंसक आंदोलन शुरू कर दिया। दक्षिण अफ्रीका में अपने 21 वर्षों के लंबे संघर्ष के दौरान ही उन्होंने पहली बार सत्याग्रह (Satyagraha - Truth Force) के अचूक हथियार का आविष्कार और सफल प्रयोग किया, जिसने उन्हें एक साधारण वकील से एक महान नेता में बदल दिया।
4. दक्षिण अफ्रीका में अपने सफल अभियानों के बाद, महात्मा गांधी 9 जनवरी 1915 को भारत वापस लौटे, और उनके इसी ऐतिहासिक आगमन की स्मृति में भारत सरकार हर साल इस दिन को प्रवासी भारतीय दिवस (Pravasi Bharatiya Divas) के रूप में गौरव के साथ मनाती है। भारत लौटने पर उनके राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) ने उन्हें सलाह दी कि वे सक्रिय राजनीति में उतरने से पहले कम से कम एक वर्ष तक पूरे भारत का भ्रमण करें ताकि वे देश की वास्तविक स्थिति को समझ सकें। गांधी जी ने देश के सुदूर गांवों की यात्रा की, जहाँ उन्होंने भारत की अत्यधिक गरीबी, अशिक्षा और अंग्रेजों के क्रूर शोषण को अपनी आँखों से साक्षात् देखा। उन्होंने अहमदाबाद के निकट साबरमती आश्रम (Sabarmati Ashram) की स्थापना की और अपने विलासी जीवन और पाश्चात्य पोशाक का त्याग कर केवल एक साधारण सूती धोती धारण कर ली। उन्होंने देशवासियों को यह संदेश दिया कि भारत की असली आत्मा उसके महानगरों में नहीं बल्कि उसके धूल-धूसरित पिछड़े गांवों में बसती है, और जब तक ग्रामीण भारत का उत्थान नहीं होगा, तब तक देश की आजादी का कोई अर्थ नहीं होगा, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन सीधे आम जनता से जुड़ गया।
5. भारत की मुख्यधारा की राजनीति में महात्मा गांधी का पहला बड़ा और सफल प्रयोग वर्ष 1917 में बिहार के चंपारण (Champaran Satyagraha) जिले से शुरू हुआ, जहां गरीब किसानों को नील की खेती करने के लिए मजबूर किया जाता था। अंग्रेजों की दमनकारी तीनकठिया प्रणाली (Tinkathia System) के खिलाफ गांधी जी ने अहिंसक विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल शुरू की, जिसके आगे ब्रिटिश प्रशासन को झुकना पड़ा और किसानों को शोषण से मुक्ति मिली। चंपारण की इस ऐतिहासिक सफलता के बाद ही रवींद्रनाथ टैगोर ने उन्हें आदरपूर्वक 'महात्मा' (Mahatma) की उपाधि दी, और बिहार के आम लोगों ने उन्हें प्यार से 'बापू' (Bapu) कहना शुरू कर दिया। इसके तुरंत बाद साल 1918 में गुजरात के खेड़ा (Kheda Satyagraha) में फसल बर्बाद होने के बावजूद अंग्रेजों द्वारा वसूले जा रहे भारी लगान के खिलाफ उन्होंने सफल मोर्चा खोला। खेड़ा सत्याग्रह के दौरान ही उन्हें सदार वल्लभभाई पटेल (Sardar Vallabhbhai Patel) जैसे निष्ठावान साथी मिले, जिन्होंने गांधी जी के कंधे से कंधा मिलाकर काम किया। इन शुरुआती सत्याग्रहों ने देश के कोने-कोने में गांधी जी के नाम और उनकी अहिंसक कार्यप्रणाली को स्थापित कर दिया और देश की पीड़ित जनता में आजादी की एक नई उम्मीद जगा दी।
6. प्रथम विश्व युद्ध के बाद जब अंग्रेजों ने भारत को स्वायत्तता देने के बजाय दमनकारी रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act) लागू किया और अमृतसर में बर्बर जलियांवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre) को अंजाम दिया, तो गांधी जी का अंग्रेजों के न्याय से पूरी तरह भरोसा उठ गया। इसके विरोध में उन्होंने साल 1920 में राष्ट्रव्यापी असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) की शुरुआत की, जो भारत के इतिहास का पहला सबसे बड़ा जन-आंदोलन बना। गांधी जी ने देशवासियों से ब्रिटिश सरकारी नौकरियों, अदालतों, विद्यालयों, विदेशी कपड़ों और उपाधियों का पूरी तरह बहिष्कार करने का पुरजोर आह्वान किया। उन्होंने आत्मनिर्भरता के प्रतीक के रूप में स्वदेशी (Swadeshi) उत्पादों को बढ़ावा दिया और घर-घर में चरखा (Charkha) कातकर सूत बनाने के आंदोलन को एक राष्ट्रीय अभियान बना दिया। यह आंदोलन अत्यंत सफल चल रहा था और आजादी करीब दिखाई दे रही थी, तभी फरवरी 1922 में उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा (Chauri Chaura Incident) में एक उत्तेजित भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी जिससे 22 पुलिसकर्मी जिंदा जल गए। अहिंसा के अपने परम सिद्धांत पर अडिग रहते हुए गांधी जी ने बिना किसी संकोच के इस चरम पर पहुंच चुके आंदोलन को तुरंत वापस ले लिया, जिससे देश के कई बड़े नेता हैरान रह गए।
7. असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद कुछ वर्षों तक रचनात्मक कार्यों और सामाजिक सुधारों में व्यस्त रहने के बाद, गांधी जी ने साल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन (Civil Disobedience Movement) की ऐतिहासिक घोषणा की। इस आंदोलन का मुख्य आकर्षण उनकी प्रसिद्ध दांडी यात्रा (Dandi March / Salt Satyagraha) थी, जिसे दुनिया के सबसे प्रभावशाली अहिंसक अभियानों में गिना जाता है। गांधी जी ने अपने 78 चुनिंदा अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से समुद्रतटीय गांव दांडी तक 240 मील की पैदल यात्रा सिर्फ 24 दिनों में पूरी की और 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर नमक बनाकर ब्रिटिश सरकार के नमक कानून को तोड़ दिया। नमक जैसे बुनियादी और रोजमर्रा की जरूरत के मुद्दे को उठाकर गांधी जी ने समाज के हर वर्ग, विशेषकर महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम की मुख्यधारा से जोड़ दिया। इस आंदोलन की विशालता से घबराकर ब्रिटिश सरकार को गांधी जी के साथ समान स्तर पर बातचीत करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप गांधी-इरविन समझौता (Gandhi-Irwin Pact) हुआ। इस समझौते के तहत गांधी जी लंदन में आयोजित द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (Second Round Table Conference) में कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने गए, जिसने साबित कर दिया कि कांग्रेस ही भारत की असली आवाज है।
8. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं की सहमति के बिना भारत को युद्ध में ढकेल दिया और स्वतंत्रता देने की मांगों को पूरी तरह खारिज कर दिया, तब गांधी जी ने अंतिम आर-पार की लड़ाई का मन बनाया। उन्होंने 8 अगस्त 1942 को मुंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान से भारत के तीसरे सबसे बड़े जन-आंदोलन यानी भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) का शंखनाद किया। इस मंच से उन्होंने देशवासियों को एक अत्यंत शक्तिशाली और अमर मंत्र दिया—"करो या मरो" (Do or Die), जिसका अर्थ था कि या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस प्रयास में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे। आंदोलन शुरू होते ही ब्रिटिश सरकार ने रात के अंधेरे में ही गांधी जी और कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर आगा खां पैलेस (Agha Khan Palace, Pune) में कैद कर दिया। लेकिन इस बार देश की जनता नेतृत्वहीन होने के बावजूद खुद ही उठ खड़ी हुई और पूरे देश में अभूतपूर्व हड़तालें, प्रदर्शन और ब्रिटिश प्रतीकों पर हमले हुए। यद्यपि इस आंदोलन को अंग्रेजों ने बलपूर्वक दबाने की कोशिश की, लेकिन वे समझ गए थे कि अब भारतीयों को अधिक दिनों तक गुलाम बनाकर रखना पूरी तरह असंभव हो चुका है।
9. महात्मा गांधी केवल एक महान राजनीतिक नेता ही नहीं थे, बल्कि वे एक दूरदर्शी दार्शनिक, समाज सुधारक और अद्वितीय मानवतावादी विचारक भी थे, जिनका संपूर्ण जीवन ही उनका संदेश था। उनके विचारों के केंद्र में सत्य (Truth) और अहिंसा (Non-violence) के दो अविनाशी स्तंभ थे, जिन्हें वे ब्रह्मांड की सबसे बड़ी और अजेय शक्तियां मानते थे। उन्होंने समाज के वंचितों और अछूत समझे जाने वाले लोगों के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया और उन्हें आदरपूर्वक 'हरिजन' (Harijan - ईश्वर की संतान) नाम दिया। उन्होंने समाज के सभी वर्गों के समान कल्याण के लिए सर्वोदय (Welfare of All) की अवधारणा दी और समाज के अंतिम व्यक्ति के आर्थिक उत्थान के लिए अंत्योदय (Antyodaya) पर जोर दिया। गांधी जी पर्यावरण के अनुकूल और स्वावलंबी जीवन शैली के प्रबल समर्थक थे, इसलिए उन्होंने ग्राम स्वराज (Gram Swaraj) और कुटीर उद्योगों की वकालत की। उनका मानना था कि वास्तविक स्वतंत्रता केवल अंग्रेजों के चले जाने से नहीं मिलेगी, बल्कि जब तक समाज से जातिवाद, सांप्रदायिक नफरत, छुआछूत और हिंसा का समूल नाश नहीं होगा, तब तक भारत सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और सुखी नहीं हो पाएगा।
10. भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन देश का भयानक सांप्रदायिक विभाजन गांधी जी के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी साबित हुआ, जिसके घावों को भरने के लिए वे जीवन के अंतिम दिनों तक दंगा प्रभावित क्षेत्रों में शांति मार्च करते रहे। स्वतंत्रता के मात्र पांच महीने बाद, 30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय नाथूराम गोडसे नामक युवक ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। उनके मुख से निकले अंतिम शब्द "हे राम" (Hey Ram) आज भी देश के हृदय में गूंजते हैं, और उनकी मृत्यु पर प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि 'आने वाली नस्लें शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़-मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति कभी इस धरती पर चला था'। उनके महान जीवन और विचारों ने वैश्विक स्तर पर मार्टिन लूथर किंग जूनियर (Martin Luther King Jr.) और नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela) जैसे दिग्गजों को प्रेरित किया, जिसके कारण संयुक्त राष्ट्र संघ उनके जन्मदिन 2 अक्टूबर को हर साल अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (International Day of Non-Violence) के रूप में मनाता है। आज 21वीं सदी में भी, जब पूरी दुनिया युद्ध, पर्यावरण संकट, असमानता और नफरत से जूझ रही है, महात्मा गांधी के विचार शांति और सद्भाव का मार्ग दिखाने वाले सबसे प्रासंगिक प्रकाश स्तंभ बने हुए हैं।

.jpg)