Dr. APJ Abdul Kalam Biography in Hindi: मिसाइल मैन के जीवन के 10 प्रेरक अध्याय
1. भारत के इतिहास में कुछ ऐसी महान विभूतियाँ हुई हैं जिन्होंने अपने सादगीपूर्ण जीवन और असाधारण कार्यों से पूरे विश्व पटल पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है, और इन्हीं महापुरुषों में से एक अत्यंत सम्मानित नाम डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का है। उनका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था और उनका जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के एक छोटे से तटीय शहर रामेश्वरम के एक साधारण तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता जैनुलाब्दीन एक स्थानीय मस्जिद के इमाम और एक साधारण नाविक थे, जो पर्यटकों को अपनी नाव से रामेश्वरम और धनुषकोडी के बीच ले जाते थे, जबकि उनकी माता आशियम्मा एक अत्यंत दयालु और धार्मिक गृहणी थीं। कलाम साहब का बचपन अत्यधिक गरीबी और अभावों के बीच बीता, लेकिन उनके परिवार के उच्च नैतिक मूल्यों, आपसी सद्भाव और कड़ी मेहनत के वातावरण ने उनके भविष्य की मजबूत नींव रखी। वे बचपन से ही बेहद जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे और उनमें कुछ नया सीखने की ललक हमेशा रहती थी, जिसने उन्हें आगे चलकर इतिहास रचने के लिए प्रेरित किया।
2. कलाम साहब के शुरुआती जीवन का संघर्ष किसी भी युवा के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत हो सकता है, क्योंकि उन्होंने बहुत छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियों को संभालना सीख लिया था। गरीबी के कारण जब उनके परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा, तो बाल कलाम ने अपने परिवार की मदद करने के लिए सुबह तड़के उठकर समाचार पत्र (Newspapers) बेचने का काम शुरू किया। वे सुबह चार बजे उठकर गणित की ट्यूशन पढ़ते थे, फिर रेलवे स्टेशन जाकर अखबार लेते थे और पूरे रामेश्वरम शहर में साइकिल से घूम-घूम कर उन्हें वितरित करते थे। इस कठिन दिनचर्या के बाद भी वे अपनी स्कूली शिक्षा पर पूरा ध्यान देते थे और उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम के श्वार्ट्ज हाई स्कूल से पूरी की। उनके शिक्षकों के अनुसार, वे एक असाधारण छात्र नहीं थे, लेकिन उनमें कड़ी मेहनत करने की बेजोड़ क्षमता और विषयों को गहराई से समझने की तीव्र इच्छा थी, विशेषकर गणित और भौतिकी विषयों में उनकी रुचि बचपन से ही काफी असाधारण थी।
3. स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद कलाम साहब ने अपनी उच्च शिक्षा के लिए कदम बढ़ाया और उन्होंने वर्ष 1954 में सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से भौतिकी (Physics) में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। भौतिकी की डिग्री लेने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि उनकी असली रुचि विमानन विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र में है, जिसके बाद वे वर्ष 1955 में मद्रास चले गए। वहाँ उन्होंने प्रतिष्ठित मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग (Aerospace Engineering) की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया, जो उनके जीवन का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहाँ पढ़ाई के दौरान एक बार उनके प्रोफेसर ने उनके द्वारा बनाए गए एयरक्राफ्ट डिजाइन प्रोजेक्ट से नाखुश होकर उन्हें अल्टीमेटम दिया था कि यदि तीन दिन में डिजाइन नहीं सुधरा, तो उनकी स्कॉलरशिप रद्द कर दी जाएगी। कलाम साहब ने बिना सोए लगातार तीन दिन काम करके ऐसा शानदार डिजाइन तैयार किया कि प्रोफेसर भी हैरान रह गए, जिससे यह साबित होता है कि वे दबाव में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले कर्मयोगी थे।
4. इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम साहब का सपना भारतीय वायुसेना में एक लड़ाकू पायलट बनने का था, लेकिन नियति को उनके लिए कुछ और ही मंजूर था। पायलट भर्ती की परीक्षा में उन्होंने नौवां स्थान प्राप्त किया था, जबकि केवल आठ ही सीटें उपलब्ध थीं, जिससे वे बेहद निराश हुए और शांति की तलाश में ऋषिकेश के स्वामी शिवानंद के आश्रम चले गए। स्वामी जी ने उन्हें ढांढस बंधाया और कहा कि इस असफलता को स्वीकार करो क्योंकि ईश्वर के पास तुम्हारे लिए कोई बड़ा और अधिक महत्वपूर्ण मिशन है। इसके बाद कलाम साहब ने वर्ष 1958 में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय में एक वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। यहाँ उन्होंने भारतीय सेना के लिए एक छोटा होवरक्राफ्ट (Hovercraft) डिजाइन करके अपनी तकनीकी योग्यता का लोहा मनवाया, जिसने उनके लिए भविष्य के बड़े वैज्ञानिक अवसरों के द्वार खोल दिए।
5. कलाम साहब के जीवन का सबसे स्वर्णिम वैज्ञानिक अध्याय तब शुरू हुआ जब वर्ष 1969 में उनका तबादला भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान परियोजना में हुआ। इसरो में उन्हें ऐतिहासिक SLV-III (Satellite Launch Vehicle) परियोजना का परियोजना निदेशक (Project Director) नियुक्त किया गया, जो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की दिशा बदलने वाला था। इस परियोजना में लगातार दस वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद, जब पहला प्रक्षेपण वर्ष 1979 में असफल हो गया, तो कलाम साहब ने हार नहीं मानी और टीम का हौसला बढ़ाया। इसके ठीक एक साल बाद 18 जुलाई 1980 को उनकी देखरेख में भारत ने सफलतापूर्वक रोहिणी उपग्रह (Rohini Satellite) को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर इतिहास रच दिया। इस महान सफलता के साथ ही भारत अंतरिक्ष क्लब का छठा सदस्य बन गया, और डॉ. कलाम को देश के वैज्ञानिक परिदृश्य में एक अत्यंत विशिष्ट पहचान और अपार सम्मान प्राप्त हुआ।
6. इसरो की अभूतपूर्व सफलता के बाद भारत सरकार ने रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए डॉ. कलाम को पुनः डीआरडीओ में वापस बुलाया और उन्हें एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) का प्रमुख बनाया। डॉ. कलाम के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत ने मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में ऐसी छलांग लगाई कि पूरी दुनिया हैरान रह गई, और उन्होंने स्वदेशी तकनीक से मिसाइलों का निर्माण शुरू किया। उनके मार्गदर्शन में भारतीय वैज्ञानिकों की टीम ने अग्नि (Agni) और पृथ्वी (Prithvi) जैसी घातक और सटीक मारक क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलों का सफल विकास किया। इसके अलावा त्रिशूल, आकाश और नाग जैसी मिसाइलों के विकास ने भारत को सैन्य सुरक्षा के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर और शक्तिशाली राष्ट्रों की श्रेणी में खड़ा कर दिया। रक्षा के क्षेत्र में उनके इसी ऐतिहासिक और युगांतरकारी योगदान के कारण उन्हें पूरे आदर के साथ "मिसाइल मैन ऑफ इंडिया" (Missile Man of India) के नाम से पुकारा जाने लगा।
7. डॉ. कलाम की वैज्ञानिक उपलब्धियों का सबसे चरम बिंदु वर्ष 1998 में आया जब उन्होंने भारत को एक पूर्ण परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बनाने में मुख्य भूमिका निभाई। मई 1998 में राजस्थान के पोखरण में किए गए पोखरण-II परमाणु परीक्षण (Pokhran-II Nuclear Tests) के दौरान वे रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार और डीआरडीओ के महानिदेशक के रूप में इस पूरे मिशन के मुख्य रणनीतिकार थे। अमेरिकी खुफिया उपग्रहों और जासूसों की नजरों से बचकर सेना की वर्दी में परमाणु परीक्षण स्थल पर काम करना और परमाणु विस्फोटों को सफलतापूर्वक अंजाम देना उनकी महान प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है। इस ऐतिहासिक सफलता के बाद भारत ने स्वयं को परमाणु हथियार संपन्न घोषित किया, जिससे वैश्विक मंच पर भारत का मान-सम्मान कई गुना बढ़ गया। इस दौरान डॉ. कलाम और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष आर. चिदंबरम की जोड़ी ने देश की संप्रभुता को सुरक्षित करने के लिए दिन-रात एक कर दिया था।
8. वैज्ञानिक के रूप में देश की महान सेवा करने के बाद डॉ. कलाम के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक पद पर आसीन कर दिया। वर्ष 2002 में भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों के सर्वसम्मत समर्थन से उन्हें भारत का 11वां राष्ट्रपति (11th President of India) चुना गया। राष्ट्रपति भवन में उनके प्रवेश के साथ ही इस सर्वोच्च पद की गरिमा और अधिक बढ़ गई, क्योंकि वे देश के पहले ऐसे गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति थे जो पूरी तरह से वैज्ञानिक पृष्ठभूमि से आए थे। राष्ट्रपति के रूप में उनके कार्यकाल को "जनता के राष्ट्रपति" (People's President) के रूप में याद किया जाता है, क्योंकि उन्होंने राष्ट्रपति भवन के दरवाजे आम जनता, विशेषकर गरीब बच्चों और छात्रों के लिए हमेशा खुले रखे थे। उन्होंने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी अपनी सादगी नहीं छोड़ी और वे हमेशा देश के कोने-कोने में जाकर युवाओं और बच्चों से सीधा संवाद स्थापित कर उन्हें बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित करते रहे।
9. डॉ. कलाम केवल एक महान वैज्ञानिक और राष्ट्रपति ही नहीं थे, बल्कि वे एक बेहद संवेदनशील लेखक, दार्शनिक और युवाओं के सच्चे मार्गदर्शक भी थे, जिन्होंने कई प्रेरक पुस्तकें लिखीं। उनकी आत्मकथा "विंग्स ऑफ फायर" (Wings of Fire) और उनकी अन्य पुस्तकें जैसे "इग्नाइटेड माइंड्स" (Ignited Minds), "इंडिया 2020", और "मिशन इंडिया" आज भी करोड़ों युवाओं को जीवन में कुछ बड़ा करने की राह दिखाती हैं। वे हमेशा कहते थे कि "सपने वो नहीं हैं जो हम सोते हुए देखते हैं, बल्कि सपने वो हैं जो हमें सोने नहीं देते", और उनका यह विचार आज भी हर युवा के दिल में जोश भर देता है। राष्ट्रपति पद से सेवामुक्त होने के बाद भी उन्होंने आराम करने के बजाय पढ़ाना पसंद किया और वे शिलांग, अहमदाबाद और इंदौर के भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में छात्रों को व्याख्यान देते रहे।
10. कलाम साहब का जीवन जितना सादा था, उनका प्रस्थान भी उतना ही कर्मठ और गरिमापूर्ण रहा, जो अंत तक उनके काम के प्रति समर्पण को दर्शाता है। 27 जुलाई 2015 को जब वे आईआईएम शिलांग में छात्रों को "रहने योग्य पृथ्वी" विषय पर व्याख्यान दे रहे थे, तभी अचानक दिल का दौरा पड़ने के कारण वे मंच पर ही गिर पड़े और हमेशा के लिए शांत हो गए। उनके निधन की खबर से पूरा देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व शोक की लहर में डूब गया, और भारत सरकार ने उनके सम्मान में सात दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की। डॉ. कलाम को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" (Bharat Ratna) सहित पद्म भूषण और पद्म विभूषण से भी अलंकृत किया गया था। उनका पूरा जीवन हमें यह सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आपके इरादे मजबूत हैं और आपमें देश सेवा का जज्बा है, तो आप दुनिया के किसी भी शिखर को छू सकते हैं।
